भरी महफिल मे एक खामोशी छा गयी
इस भीड् मे तन्हाई मुझको सता गयी,
आज इन
चेहरो को देख के
मुझे फिर से किसी की याद आ गयी,
हाथो मे गुलाब लेकर मै कुछ कदम ही चला था
के तब तक उसकी माँ आ गयी,
मेरे
कदम वहीँ थम से गये दोस्तोँ
और तकदीर इक बार मुझे फिर से ठुकरा गयी,
मेरी नज़रे उनकी दीदार को तरसती रही
और वो घर से बाहर नक़ाब मे आ गयी,
अरमाँ था उन से दिल का नाता जोड्ने का
मैने उन्हें खत
लिखा जवाब मे वो मुझे भाई बना गयी,
बेनाम है मोहब्बत मेरा इसे कोई नाम दे दो
अफसाने औरो के मुझको जला गयी।
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