मुझसे यूं जो हमेशा झूठ बोलते आये हो
मुश्किलो से तुम भी कहाँ बच पाये हो ,
हैरान न होओ मेरी तन्हाई पे
भीड् मे भी खुद को अकेला पाये हो,
हम तो आप पे अरमानों की दुनिया लुटाते रहे है
और इक आप हो जो हमपे सच भी न लुटा पाये हो,
मोह्ब्ब्त मेरी आपकी ही अमानत है
जमाने की बुरी नज़र् से कहाँ इसे बचा पाये हो,
भरोसा मेरा तोड के जो यूं मुस्कुरा रहे हो
खुद को भी कहाँ इस सितम से बचा पाये हो,
मैं बीच तुफां में फँसा हु तो क्या
तुम भी तो हर बार किनारे से उतर आये हो,
वफा मेरी वही है पर ऐतवार की ताकत नही रही
सहारा देकर हर बार छोड आये हो,
ये अनहोनी फिर से हो रही है
के खामोशी मे तुम आवाज़ लगाये हो ।

-Deepak Kumar

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